प्रथम विश्वयुद्ध (1914–1918) और द्वितीय विश्वयुद्ध (1939–1945) के दौरान वर्तमान हरियाणा क्षेत्र ने ब्रिटिश भारतीय सेना को सैनिक, संसाधन और युद्ध-संस्कृति—तीनों स्तरों पर उल्लेखनीय योगदान दिया। यद्यपि उस समय हरियाणा एक पृथक राज्य के रूप में अस्तित्व में नहीं था, बल्कि औपनिवेशिक पंजाब प्रांत तथा उससे संबद्ध रियासती संरचनाओं का हिस्सा था, फिर भी हिसार, रोहतक, गुड़गांव, करनाल और अम्बाला जैसे जिलों से सैनिक भर्ती का पैटर्न स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। प्रथम विश्वयुद्ध के लिए उपलब्ध सांख्यिकीय सामग्री से ज्ञात होता है कि वर्तमान हरियाणा क्षेत्र से भर्ती का स्तर अत्यंत ऊँचा था और विभिन्न जिलों में इसमें पर्याप्त असमानता थी। इस असमानता का कारण केवल जनसंख्या नहीं, बल्कि ब्रिटिश “मार्शल रेस” नीति, भूमि-स्वामी कृषक समुदायों की सामाजिक स्थिति, स्थानीय अभिजन नेतृत्व, सैन्य परंपरा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी थे। द्वितीय विश्वयुद्ध में भारतीय सेना का अभूतपूर्व विस्तार हुआ और भर्ती की परंपरागत सीमाएँ कुछ हद तक शिथिल हुईं, फिर भी पंजाब-हरियाणा क्षेत्र ब्रिटिश सैन्य भर्ती का एक केन्द्रीय आधार बना रहा। यह शोध-पत्र प्रतिपादित करता है कि हरियाणा की सैनिक परंपरा कोई उत्तर-स्वतंत्रता निर्मित घटना नहीं थी, बल्कि उसका औपनिवेशिक काल में ही एक मजबूत संस्थागत, सामाजिक और सांस्कृतिक आधार तैयार हो चुका था।
Sandeep Kumar , Amit Chamoli , "प्रथम एवं द्वितीय विश्वयुद्धों में हरियाणा के सैनिकों की भर्ती, संख्या, क्षेत्रीय वितरण एवं योगदान का मात्रात्मक एवं गुणात्मक विश्लेषण तथा ब्रिटिश “मार्शल रेस” नीति का प्रभाव", Vol. 3, Issue 9, 15-12-2025, pp. 22-30.