लोक संगीत को मानवीय समूह अपने दिल की धड़कनों से सींचता है, अरमानों से पालता है। लोक संगीत मानवीय जीवन की परम्परा के वेग के साथ घुला होता है, मूल प्रवृत्तियों के साथ जुड़ा हुआ होता है और जन्मभूमि के साथ बंधा हुआ होता है। लोक संगीत में मानवीय समूह या जाति विशेष की मूल ध्वनि की सारी स्वर लहरियाँ उभरती हैं। लोक संगीत किसी भी मानवीय समूह के सांस्कृतिक रूपी महल का नींव पत्थर है। लोक संगीत का जन्म प्रकृति के आंगन में होता है। लोक संगीत समाज की दैनिक अवस्थाओं को रंजक रूप में प्रतिबिम्बित करता है। लोक संगीत एक ऐसी गंगा है जिसमें हर आयु तथा हर वर्ग का व्यक्ति डुबकियाँ लगाता है और स्वयं को धन्य समझता है।
लोक संगीत जन-साधारण का स्वाभाविक उद्गार है जो प्राचीन काल से मानवीय जीवन में सिहरन करता चला आ रहा है। लोक संगीत में प्रयुक्त गीतों में लोक बोली का प्रयोग होता है। इसी कारण इन गीतों की बोली/भाषा मधुर व सरल होती है। इनकी बोली सरल एवं साधारण होने के कारण ये सहज ही मुँह पर चढ़ जाते हैं और होंठों पर मिश्री की भाँति घुल जाते हैं। लोक संगीत के रचयिता अज्ञात होते हैं, लेकिन किसी व्यक्ति विशेष द्वारा इनकी रचना सहज स्वभाव से की गई होती है। यह कला मौखिक रूप से चलती हुई लम्बी यात्रा करते हुए रूप बदलती रहती है, अर्थात् लोक संगीत पीढ़ी-दर-पीढ़ी सदियों से चलता रहता है।
लोक संगीत की यह विशेषता है कि यह कभी पुराना नहीं होता। इसमें हमेशा ताजे फूलों की सुगंध आती है। लोक संगीत में लोक-मन की अभिव्यक्ति होती है। लोक संगीत के अत्यन्त सरल स्वरूप के कारण अनेकों लोक गीत बिना वाद्यों के या बहुत कम वाद्यों का प्रयोग करते हुए गाए जाते हैं। लोक संगीत के सन्दर्भ में श्री लक्ष्मी नारायण गर्ग जी ने कहा है, “लोक संगीत की शर्त न अलगोजे की है, न डफ की, न खेत की, न खलियान की। किसी भी समय, किसी भी स्थान पर, किसी भी अनजान को वह मस्ती लुटाने को तत्पर रहता है।”
अतः हम कह सकते हैं कि लोक संगीत जनजीवन का वह आकर्षण वेग है जो उससे अलग हो ही नहीं सकता। लोक संगीत का न आदि है, न अन्त है; यह तो केवल मात्र संगीतात्मक स्फूर्त अभिव्यक्ति है। भारत में प्रत्येक प्रदेश का अपना लोक संगीत, लोक गीत एवं लोकधुनें हैं। परन्तु पंजाबी लोक संगीत का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत एवं व्यापक है। उसमें संगीत के विविध रूप एवं तत्व अपने समस्त सौन्दर्य के साथ सम्मिलित होकर मानव मन के भावों को अलंकृत और झंकृत करते हैं।
पंजाबी लोक संगीत कलात्मक सौन्दर्य से परिपूर्ण होने के कारण लोक जीवन के लिए अत्यन्त आनंददायक रहा है। पंजाबी लोक संगीत पंजाब के जनजीवन पर आधारित है, जो पंजाबियों के मूल स्वभाव की विशेषताओं को अपने अंदर समाविष्ट किए हुए है। पंजाबी लोक संगीत में पंजाब के लोगों के सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन का पूर्ण विवरण मिलता है। पंजाबी लोक संगीत यहाँ के जन-सामान्य के मनोभावों का सम्बन्ध सुन्दरता और शृंगार के साथ जोड़ता है।
पंजाबी लोक संगीत हर पल, हर क्षण पंजाबियों के जीवन की अलग-अलग परिस्थितियों की सामूहिक अभिव्यक्ति है और पंजाबियों के रंगीले जीवन की मुँह बोलती तस्वीर है। पंजाबी लोक संगीत की परम्परा विश्व की लोक परम्पराओं में विशेष स्थान रखती है एवं श्रेष्ठता के पक्ष से सर्वश्रेष्ठ है। पंजाबी लोक संगीत के अभूतपूर्व विकास और इसे समृद्ध बनाने में जब हम महान कलाकारों के योगदान को निहारते हैं, तो एक महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व, व्यवस्थापक, संस्थापक, रचनाकार, गीतकार, गायक, पंजाबी स्वरों के सम्राट, पंजाबी गीतों की आत्मा, पंजाबी गायकी का मुकुट श्री लालचन्द ‘यमला जट्ट’ का अमूल्य योगदान पाते हैं। पंजाबी लोक संगीत को समृद्ध बनाने में श्री लालचन्द ‘यमला जट्ट’ के योगदान का अवलोकन करना प्रस्तुत शोध का विषय रहेगा।
Tanu Chaudhary, "पंजाबी लोक संगीत को समृद्ध बनाने में श्री लालचन्द ‘यमला जट्ट’ का योगदान", Vol. 3, Issue 10, 24-01-2026, pp. 105-111.