यह शोध भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की बहुआयामी भूमिका का विश्लेषण करता है, जिसमें उनका राजनीतिक नेतृत्व, क्रांतिकारी भागीदारी, और सामाजिक सुधारों में योगदान को केंद्र में रखा गया है। प्राचीन सामाजिक रूढ़ियों और उपनिवेशी दमन के बीच महिलाओं ने अपने साहस, संगठन क्षमता और विचारों के माध्यम से आंदोलन को एक समग्र सामाजिक क्रांति में परिवर्तित कर दिया। इस अध्ययन में सरोजिनी नायडू, विजयलक्ष्मी पंडित, रानी लक्ष्मीबाई, सुभद्राकुमारी चौहान, सावित्रीबाई फुले और अन्य अनेक महिला सेनानियों की भूमिकाओं को विश्लेषित किया गया है, जिन्होंने न केवल स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी, बल्कि शिक्षा, सामाजिक समानता और स्त्री चेतना की नींव रखी। गांधीजी के नेतृत्व में महिलाओं की भागीदारी में जो अभूतपूर्व वृद्धि हुई, उसने उन्हें सामाजिक एवं राजनीतिक आंदोलन का सशक्त स्तंभ बना दिया। यह शोध यह निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि महिलाओं की भूमिका केवल सहायक नहीं, बल्कि निर्णायक और क्रांतिकारी रही है। स्वतंत्रता संग्राम उनके लिए केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि आत्म-चेतना, आत्मसम्मान और सामाजिक पुनर्रचना का भी अवसर बना। यह चेतना आगे चलकर भारत में महिला सशक्तिकरण आंदोलन की आधारशिला बनी।
Saroj Bala, Jaswant Singh , Amit Chamoli, "भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भूमिका: नेतृत्व, संघर्ष और सामाजिक पुनर्निर्माण की दृष्टि से विश्लेषण", Vol. 2, Issue 11, 15-02-2025, pp. 58-71.