यह शोध-पत्र भारतीय युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य और पहचान-निर्माण पर सोशल मीडिया के प्रभाव का समाजशास्त्रीय विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अध्ययन द्वितीयक स्रोतों पर आधारित व्याख्यात्मक एवं आलोचनात्मक साहित्य-संश्लेषण है और किसी काल्पनिक प्राथमिक सर्वेक्षण का दावा नहीं करता। विश्लेषण का केंद्रीय तर्क है कि प्रभाव केवल उपयोग की अवधि से नहीं, बल्कि उपयोग की शैली, सामग्री, सामाजिक तुलना, दर्शक-प्रतिक्रिया, साइबरबुलिंग, एल्गोरिदमिक दृश्यता, ऑफलाइन संबंधों और पूर्ववर्ती संवेदनशीलता से बनता है। निष्क्रिय स्क्रॉलिंग, आदर्शीकृत छवियों से तुलना, लोकप्रियता-सूचकों पर निर्भरता और ऑनलाइन बहिष्करण चिंता, असंतोष, नींद में बाधा तथा वास्तविक और प्रस्तुत स्व के बीच दूरी बढ़ा सकते हैं। इसके विपरीत सक्रिय, प्रामाणिक और उद्देश्यपूर्ण सहभागिता सामाजिक समर्थन, आत्म-अभिव्यक्ति और समुदाय से जुड़ाव को प्रोत्साहित कर सकती है। भारतीय संदर्भ में परिवार, लिंग, भाषा, वर्ग और ग्रामीण-शहरी असमानता निर्णायक हैं। निष्कर्षतः सोशल मीडिया को मानसिक परेशानी का एकमात्र कारण मानने के बजाय व्यक्ति, समाज और मंचीय संरचना के पारस्परिक संबंधों का विश्लेषण आवश्यक है।
राजू नैन, डॉ. खुशबू लता, "सोशल मीडिया, मानसिक स्वास्थ्य और युवा पहचान-व्यथा: भारतीय संदर्भ में एक समाजशास्त्रीय अध्ययन", Vol. 2, Issue 12, 29-03-2025, pp. 11-20.