स्वतंत्रता के बाद भारत जिन प्रमुख युद्धों से गुज़रा—1947-48 का प्रथम भारत-पाक युद्ध, 1962 का चीन युद्ध, 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध तथा 1999 का कारगिल युद्ध—उन सबमें हरियाणा के सैनिकों ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई। यह योगदान केवल संख्यात्मक नहीं था, बल्कि युद्धभूमि पर नेतृत्व, अदम्य साहस, रेजिमेंटीय अनुशासन और सर्वोच्च बलिदान के रूप में प्रकट हुआ। 1947-48 में जिंद और महेन्द्रगढ़ क्षेत्र से आने वाले सैनिकों के वीर चक्र, 1962 में रेज़ांग ला की ‘अहीर कम्पनी’ का ऐतिहासिक प्रतिरोध, 1965 में रोहतक, गुरुग्राम और महेन्द्रगढ़ के सैनिकों की बहादुरी, 1971 में रोहतक के मेजर होशियार सिंह को मिला परमवीर चक्र, तथा 1999 कारगिल में भिवानी के लांस हवलदार राम कुमार का बलिदान—ये सभी उदाहरण इस बात को प्रमाणित करते हैं कि हरियाणा की सैन्य परम्परा स्वतंत्रता के बाद भी निरंतर और जीवंत बनी रही। साथ ही, इस अध्ययन से यह भी स्पष्ट होता है कि परमवीर चक्र की चर्चा हरियाणा के संदर्भ में प्रत्यक्ष और परोक्ष—दोनों स्तरों पर करनी चाहिए, ताकि शोध अधिक तथ्य-संगत और संतुलित बने।
Sandeep Kumar , Amit Chamoli , "स्वतंत्र भारत के प्रमुख युद्धों (1947-48, 1962, 1965, 1971 एवं 1999 कारगिल युद्ध) में हरियाणा के सैनिकों की भूमिका, बलिदान एवं परमवीर चक्र विजेताओं का अध्ययन : सैन्य परम्परा की निरंतरता के संदर्भ में", Vol. 3, Issue 11, 15-02-2026, pp. 52-60.