मानव सभ्यता के आरंभ से ही सौंदर्य के प्रति मनुष्य का आकर्षण रहा है, जिसने कला के उद्भव का मार्ग प्रशस्त किया। कला, मानव की आंतरिक सौंदर्य भावना और भावनाओं की अभिव्यक्ति का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। मनुष्य अनेक भावनाओं और संवेदनाओं का एक जटिल समुच्चय है। जब ये भावनाएँ किसी हृदय-स्थल पर सक्रिय होकर उसे सुलझाने का प्रयास करती हैं, तो उस समय उसका आंतरिक और बाह्य शरीर प्रभावित होता है और वह एक नई अनुभूति की अवस्था में पहुँच जाता है। ऐसी स्थिति में मनुष्य का समस्त व्यक्तित्व केवल अनुभूति में बदल जाता है। इसी अनुभूति की अभिव्यक्ति को हम कला कह सकते हैं, और जिन कलाओं में ललितता का तत्व विद्यमान रहता है, उन्हें ललित कलाएँ कहा जाता है।
ललित कलाओं का उद्देश्य सौंदर्य- अनुभूति के क्षेत्र का सृजन करना है। ललित कलाओं का विभाजन चित्रकला, मूर्तिकला, वास्तुकला, काव्यकला और संगीतकला के आधार पर किया गया है। इन सभी ललित कलाओं का क्षेत्र व्यापक और विस्तृत है। इनमें संगीत सबसे सूक्ष्म तथा भावप्रधान विशेषताओं से युक्त है। संगीत का संबंध सभी कलाओं से है। सभी कलाओं के गुण और लक्षण समान होते हैं, क्योंकि सभी ललित कलाओं का लक्ष्य एक ही है।
काव्य और संगीत दोनों कलाओं में अलंकारों का प्रयोग होता है। काव्य का आधार शब्द है और संगीत का आधार स्वर है। दोनों की अभिव्यक्ति का मूल स्थान नाद है। काव्य शब्दों के रूप में संगीत है और संगीत स्वरों के रूप में कविता है। इसी प्रकार स्थापत्य कला और संगीत में भी संतुलन, संयोजन और व्यवस्था का गहरा संबंध है। मूर्तिकला और संगीत में भी भावाभिव्यक्ति, गति, लय और सौंदर्य का समान प्रभाव दिखाई देता है। चित्रकला में रंग, रेखा और भावों की अभिव्यक्ति संगीत के समान ही सूक्ष्म रूप में प्रकट होती है। इस प्रकार संगीत का अन्य ललित कलाओं से घनिष्ठ संबंध है।
तनु चौधरी, "संगीत एवं अन्य ललित कलाओं के बीच सामंजस्य", Vol. 3, Issue 8, 21-11-2025, pp. 61-65.