भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में जहाँ प्रमुख रूप से पुरुष नेताओं की गाथाएँ उभरकर सामने आई हैं, वहीं महिलाओं का योगदान अपेक्षाकृत उपेक्षित रहा है। अनेक महिलाएँ बिना किसी पद या मान्यता के स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहीं, लेकिन उन्हें केवल “सहयोगी” के रूप में चित्रित किया गया। उषा मेहता ने गुप्त रेडियो के माध्यम से जनचेतना फैलाने का जोखिम उठाया, भगिनी निवेदिता ने महिला शिक्षा और सांस्कृतिक जागरण में भूमिका निभाई, और मदालसा रॉय ने कम्युनिस्ट आंदोलन के माध्यम से मजदूर महिलाओं को संगठित किया। इसी तरह भारत माता समिति और महिला कांग्रेस जैसे संगठनों ने महिलाओं को राजनीतिक और सामाजिक रूप से जागरूक करने का कार्य किया। ग्रामीण महिलाएँ प्रत्यक्ष विरोध जैसे कर न देना, जंगल कानून तोड़ना, आदि आंदोलनों में सक्रिय रहीं, जबकि शहरी महिलाएँ सभाओं, रैलियों और संगठनों के माध्यम से आंदोलन से जुड़ीं। उन्हें सामाजिक तिरस्कार का सामना भी करना पड़ा, फिर भी उन्होंने बाल विवाह, स्त्री शिक्षा और सामाजिक असमानताओं के खिलाफ आवाज उठाई। इतिहास लेखन में अब भी कई शोध अंतराल बने हुए हैं—जैसे गुमनाम महिला नेताओं के नेतृत्व का अभाव, संगठनात्मक दस्तावेजों की अनुपलब्धता, और क्षेत्रीय (विशेषतः पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत) महिलाओं की उपेक्षा। निष्कर्षतः, इन गुमनाम नायिकाओं और संगठनों के योगदान का पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है। उनका संघर्ष स्वतंत्रता की बुनियाद है, और उसे आज की पीढ़ी तक पहुँचाना इतिहास के प्रति ईमानदारी और सामाजिक न्याय का कार्य है।
Saroj Bala, Jaswant Singh , Amit Chamoli, "गुमनाम नायिकाएँ: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उपेक्षित महिला सेनानियों और उनके संगठनात्मक योगदान का पुनर्मूल्यांकन", Vol. 2, Issue 11, 14-02-2025, pp. 37-57.